Rajputs Fought Beheaded

14 क्षत्रिय जो सिर कटने के बाद भी लड़े

14 क्षत्रिय जो सिर कटने के बाद भी लड़े

1 Shaheed Baba Mati ji Punjab 1526 (Daroli Kalan Punjab)

2 Toga Singh Rathore Rajasthan 1656

3 Jaimal Mertia Mehrta Rajasthan 1507-1568

4 Rana Sanga (Maharana Sangam Singh Sisodia 12 Apr 1472-30 jan 1528)

5 Kalla Rathore(Kallaji Rathore who was born in 1544 AD village of Nagaur in Marwar)

6 Kalyan Singh Chundawt Bareli (UP) Vikrm samt 1765 kartik bdi 8

7 Balbhadr singh Rajput (Death 1857 Breli Uttar Pardesh)

8 Umed Singh Kumbhawat 14 december 1767 Bhartpur Rajasthan

9 Dal Singh Kumbhawat 14 december 1767 Bhartpur Rajasthan

10 Swai Singh Bhomia Rathore Jaisalmer Rajasthan

11 Dungr singh Bhatti 02 Aug 1856-19 aug 1887 Jaisalmer

12 Achal Das Khinchi Chauhan death 1423

13 Gora Chauhan Death 1298 (Gora and Badal were uncle and nephew)

14 Badal chauhan death 1298 Chitorgarh

2 Toga Singh Rathore

मारवाड़ का इतिहास वीरों की गाथाओं से भरा पड़ा है। वीरता किसी कि बपौती नहीं रही। इतिहास गवाह है कि आम राजपूत से लेकर खास तक ने अप सरजमीं के लिए सर कटा दिया। लेकिन इसे विडम्बना ही कहेंगे कि इतिहास में ज्यादातर उन्हीं वीरों की स्थान मिल पाया जो किसी न किसी रूप में खास थे | आम व्यक्ति की वीरता इतिहास के पन्नों पर बेहद कम आईं। आई भी तो कुछ शब्दों तक सीमित| कुछ भी कहा जाए, लेकिन इन वीरों ने नाम के लिए वीरता नहीं दिखाई। ऐसा ही एक बेहतरीन उदाहरण दिया है मारवाड़ के आम राजपूत तोगोजी राठौड़ Togaji Rathore ने, जिसने शाहजहां को महज यह यकीन दिलाने के लिए अपना सिर कटवा दिया कि राजपूत अप आन-बान के लिए बिना सिर भी वीरता पूर्वक युद्ध लड़ सकता है और उसकी पत्नी सती हो जाती है। आज का राजपूत या और कोई भले ही इसे महज कपोल-कल्पना समझे, लेकिन राजपूतों का यही इतिहास रहा है कि वे सच्चाई के लिए मृत्यु को वरण करना ही अपना धर्म समझते थे |

वर्ष 1656 के आसपास का समय था | दिल्ली पर बादशाह शाहजहां व जोधपुर Jodhpur पर राजा गजसिंह प्रथम Maharaja Gaj Singh 1st का शासन था। एक दिन शाहजहां Shajahan का दरबार लगा हुआ था। सभी अमीर उमराव और खान अपनी जगह पर विराजित थे| उसी समय शाहजहां जे कहा कि अपने दरबार में खान 60 व उमराव 62 क्यों है? उन्होंने दरबारियों से कहा कि इसका जवाब तत्काल चाहिए | सभा में सन्नाटा पसर गया | सभी एक दूसरे को ताकने लगे। सबने अपना जवाब दिया, लेकिन बादशाह संतुष्ट नहीं हुआ । आखिरकार दक्षिण का सुबेदार मीरखां खड़ा हुआ और उसने कहा कि खानों से दो बातों में उमराव आगे है इस कारण दरबार में उनकी संख्या अधिक है। पहला, सिर कटने के बावजूद युद्ध करना और दूसरा युद्धभूमि में पति के वीरगति को प्राप्त होने पर पत्नी का सति होना। शाहजहां यह जवाब सुनने के बाद कुछ समय के लिए मौन रहा | अगले ही पल उसने कहा कि ये दोनों नजारे वह अपनी आंखों से देखना चाहता है | इसके लिए उसने छह माह का समय निर्धारित किया । साथ ही उसने यह भी आदेश दिया कि दोनों बातें छह माह के भीतर साबित नहीं हुई तो मीरखां का कत्ल करवा दिया जाएगा और उमराव की संख्या कम कर दी जाएगी। इस समय दरबार में मौजूद जोधपुर के महाराजा गजसिंह जी को यह बात अखर गई| उन्होंने मीरखां से इस काम के लिए मदद करने का आश्वासन दिया |

मीरखां चार महीने तक ररजवाड़ों में घूमे, लेकिन ऐसा वीर सामने नहीं आया जो बिना किसी युद्ध महज शाहजहां के सामने सिर कटने के बाद भी लड़े और उसकी पत्नी सति हो। आखिरकार मीरखां जोधपुर महाराजा गजसिंह जी से आ कर मिले । महाराजा ने तत्काल उमरावों की सभा बुलाई| महाराजा ने जब शाहजहां की बात बताई तो सभा में सन्नाटा छा गया । महाराजा की इस बात पर कोई आगे नहीं आया । इस पर महाराजा गजसिंह जी की आंखें लाल हो गई और भुजाएं फड़कजे लगी। उन्होंने गरजना के साथ कहा कि आज मेरे वीरों में कायरता आ गई है। उन्होंने कहा कि आप में से कोई तैयार नहीं है तो यह काम में स्वयं करूँगा। महाराजा इससे आगे कुछ बोलते कि उससे पहले 18 साल का एक जवान उठकर खड़ा हुआ। उसने महाराजा को खम्माघणी करते हुए कहा कि हुकुम मेरे रहते आपकी बारी कैसे आएगी| बोलता-बोलता रुका तो महाराज ने इसका कारण पूछ लिया| उस जवान युवक ने कहा कि अन्नदाता हुकुम सिर कटने के बाद भी लड़ तो लूँगा, लेकिन पीछे सति होने वाली कोई नहीं है अर्थात उसकी शादी नहीं हो रखी है| यह वीरता दिखाने वाला था तोगा राठौड़ | महाराजा इस विचार में डूब गए कि लड़ने वाला तो तैयार हो गया, लेकिन सति होने की परीक्षा कौन दे | महाराजा ने सभा में दूसरा बेड़ा घुमाया कि कोई राजपूत इस युवक से अप बेटी का विवाह सति होने के लिए करे| तभी एक भाटी सिरदार इसके लिए राजी हो गए।

भाटी कुल री रीत, आ आजाद सूं आवती ।

करण काज कुल कीत, भटियाणी होवे सती।

महाराजा जे अच्छा मुहूर्त दिखवा कर तोगा राठौड़ का विवाह करवाया । विवाह के बाद तोगाजी ने अपनी पत्नी के डेरे में जाने से इनकार कर दिया | वे बोले कि उनसे तो स्वर्ग में ही मिलाप करूँगा । उधर, मीरखां भी इस वीर जोड़े की वीरता के दिवाने हो गये | उन्होंने तोगा राठौड़ का वंश बढ़ाने की सोच कर शाहजहां से छह माह की मोहलत बढ़वाने का विचार किया। ज्योंहि यह बात नव दुल्हन को पता चली तो उसने अपने पति तोगोजी की सूचना भिजवाई कि जिस उद्देश्य को लेकर दोनों का विवाह हुआ है वह पूरा किये बिना वे ढंग से श्वास भी नहीं ले पाएंगे| इस कारण शीघ्र ही शाहजहाँ के सामने जाने की तैयारी की जाए| महाराजा गजसिंह व मीरखां ने शाहजहाँ को सूचना भिजवा दी|

समाचार मिलते ही शाहजहां जे अपने दो बहादूर जवाजों को तोणोजी से लड़ने के लिए तेयार किया । शाहजहां ने अपने दोनों जवानों को सिखाया कि तोगा व उसके साथियों की पहले दिन भोज दिया जायेगा | जब वे लोग भोजन करने बैठेंगे उस वक्त तोगे का सिर काट देना ताकि वह खड़ा ही नहीं हो सके। उधर, तोगाजी राठौड़ आगरा पहुंच गए। बादशाह ने उन्हें दावत का न्योता भिजवाया। तोगाजी अपने साथियों के साथ किले पहुँच गए। वहां उनका सम्मान किया गया। मान-मनुहारें हुई। बादशाह की रणनीति के तहत एक जवान तोगाजी राठौड़ के ईद-गीर्द चक्कर लगाने लगा । तोगोजी को धोखा होने का संदेह ही गया। उन्होंने अपने पास बैठे एक राजपूत सरदार से कहा कि उन्हें कुछ गड़बड़ लग रही है इस कारण उनके आसपास घूम रहे व्यक्ति को आप संभाल लेना ओर उनका भी सिर काट देना। उसके बाद वह अपना काम कर देगा । दूसरी तरफ, तोगोजी की पत्नी भी सती होने के लिए सजधज कर तैयार हो गई । इतने में दरीखाने से चीखने-चिल्लाने की आवाजें आने लगी कि तोगाजी ने एक व्यक्ति को मार दिया ओर पास में खड़े किसी व्यक्ति ने तोगाजी का सिर धड़ से अलग कर दिया। तोगाजी बिना सिर तलवार लेकर मुस्लिम सेना पर टूट पड़े। तोगाजी के इस करतब पर ढोल-नणाड़े बजने लगे। चारणों ने वीर रस के दूहे शुरू किए। ढोली व ढाढ़ी सोरठिया दूहा बोलने लगे। तोगोजी की तलवार रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। बादशाह के दरीखाने में हाहाकार मच गया। बादशाह दौड़ते हुए रणक्षेत्र में पहुंचे। दरबार में खड़े राजपूत सिरदारों ने तोगोजी ओर भटियाणी जी की जयकारों से आसमाज गूंजा दिया तोगोजी की वरीता देखकर बादशाह जे महाराजा गजसिंह जी के पास माफीनामा भिजवाया और इस वीर को रोकने की तरकीब पूछी। कहते हैं कि ब्राह्मण से तोगोजी के शरीर पर गुली का छिंटा फिंकवाया तब जाकर तोगोजी की तलवार शांत हुई और धड़ नीचे गिरा। उधर, भटियाणी सोलह श्रृंगार कर तैयार बैठी थी। जमना जदी के किनारे चंदन कि चिता चुनवाई गई। तोगाजी का धड़ व सिर गोदी में लेकर भटियाणीजी राम का नाम लेते हुए चिता मेंप्रवेश कर गई|

साभार : जाहरसिंह जसोल द्वारा रचित राजस्थान री बांता पुस्तक से लेकर घम्माघणी पत्रिका द्वारा हिंदी में अनुवादित

3 Jaimal Mertia and kalla Rathore एक ऐसे वीर योद्धा से रूबरू कराने जा रहा हूं जिसका सिर कटने के बाद भी धड़ लड़ता रहा था अकबर भी यह देखकर रह गया था अश्चर्यचकित। वीरता को देखकर अकबर प्रतिमा बरवाने पर हो गया था मजबूर। भारत में मुगलों के आने के बाद भी कई ऐसे हिन्दू शासक और योद्धा हूए जिन्हों ने मुगलों के छक्के छुड़ा दिए थे आज एक ऐसे ही योद्धा की बात करने जा रहें है इस शासक का नाम राव जयमल था जोकि जयमल के पिता राव वीरमदेव थे।

इनके निधन के बाद जयमल मेड़ता के राजा बने थे एक दिन अकबर ने अपनी सेना के साथ चित्तौड़ पर हमला किया। जिसकी सूचना मिलने पर जयमल चित्तौड़ पहुंच गए। क्योंकि उदय सिंह को अबकर की पास के नगरी में होने की सूचना मिल चुकी थी जिसके उदय सिंह अपनी सेना और गद्दी को जयमल को सौंप कर पहाड़ों पर चले गए थे जब अकबर ने चित्तौड़ पर हमला किया तो जयमल वहां मौजूद थे अकबर की सेना चित्तौड़ पहुंचकर किले के दुर्ग पहाड़ों के नीचें से सुरंग खोदना शुरू कर दिया जिसके कारण बारूद लगाकर दुर्ग के परकोटे को उड़ाया जा सके। लेकिन अकबर के लिए करना इतना आसान नहीं था क्योंकि दिन के समय अकबर की सेना सुरंग खोदती थी और रात्रि के समय जयमल सेना के साथ मिलकर सुरंग को बंद कर देते थे तीन से चार ऐसा ही चलता रहा। एक रात्रि अकबर देखा कि मशाल लिए किले की दीवारों की कोई मरम्मत कर रहा है। अकबर ने उसी दौरान संग्राम नामक बंदूक से गोली चला दी। यह गोली जयमल के पैर में जा लगी।

जयमल के गोली लगते ही किले में हाहाकार मच गया। और युद्ध छिड़ गया।

ऐसी हालात में जयमल का चलना फिरना मुश्किल था जिसके बाद जयमल को कल्ला राठौड़ के कंधे पर युद्ध लड़ा। इस दौरान जयमल का सिर धड़ से अलग हो गया था फिर भी उनका धड़ लड़ता रहा था यह देखकर अकबर अश्चर्यचकित रह गया था 8000 हजार की सेना अकबर 48000 हजार सेना को मार गिराया था। अकबर जयमल और कल्ला राठौड़ की वीरता से काफी प्रभावित हो गया था जिसके बाद अकबर ने दोनों की घोड़े सवार होने वाली प्रतिमा बनवाई थी।

4 Rana Sanga

एक ऐसे वीर योद्धा से रूबरू कराने जा रहा हूं जिसका सिर कटने के बाद भी धड़ लड़ता रहा था अकबर भी यह देखकर रह गया था अश्चर्यचकित। वीरता को देखकर अकबर प्रतिमा बरवाने पर हो गया था मजबूर। भारत में मुगलों के आने के बाद भी कई ऐसे हिन्दू शासक और योद्धा हूए जिन्हों ने मुगलों के छक्के छुड़ा दिए थे आज एक ऐसे ही योद्धा की बात करने जा रहें है इस शासक का नाम राव जयमल था जोकि जयमल के पिता राव वीरमदेव थे।

इनके निधन के बाद जयमल मेड़ता के राजा बने थे एक दिन अकबर ने अपनी सेना के साथ चित्तौड़ पर हमला किया। जिसकी सूचना मिलने पर जयमल चित्तौड़ पहुंच गए। क्योंकि उदय सिंह को अबकर की पास के नगरी में होने की सूचना मिल चुकी थी जिसके उदय सिंह अपनी सेना और गद्दी को को जयमल को सौंप कर पहाड़ों पर चले गए थे जब अकबर ने चित्तौड़ पर हमला किया तो जयमल वहां मौजूद थे अकबर की सेना चित्तौड़ पहुंचकर किले के दुर्ग पहाड़ों के नीचें से सुरंग खोदना शुरू कर दिया जिसके कारण बारूद लगाकर दुर्ग के परकोटे को उड़ाया जा सके। लेकिन अकबर के लिए करना इतना आसान नहीं था क्योंकि दिन के समय अकबर की सेना सुरंग खोदती थी और रात्रि के समय जयमल सेना के साथ मिलकर सुरंग को बंद कर देते थे तीन से चार ऐसा ही चलता रहा। एक रात्रि अकबर देखा कि मशाल लिए किले की दीवारों की कोई मरम्मत कर रहा है। अकबर ने उसी दौरान संग्राम नामक बंदूक से गोली चला दी। यह गोली जयमल के पैर में जा लगी।

जयमल के गोली लगते ही किले में हाहाकार मच गया। और युद्ध छिड़ गया।

ऐसी हालात में जयमल का चलना फिरना मुश्किल था जिसके बाद जयमल को कल्ला राठौड़ के कंधे पर युद्ध लड़ा। इस दौरान जयमल का सिर धड़ से अलग हो गया था फिर भी उनका धड़ लड़ता रहा था यह देखकर अकबर अश्चर्यचकित रह गया था 8000 हजार की सेना अकबर 48000 हजार सेना को मार गिराया था। अकबर जयमल और कल्ला राठौड़ की वीरता से काफी प्रभावित हो गया था जिसके बाद अकबर ने दोनों की घोड़े सवार होने वाली प्रतिमा बनवाई थी।

5. kalla rathore

उदयपुर. जिले के केसरियाजी स्थित मइयाधाम में 23 और 24 सितंबर को दो दिन का एक अदभुत मेला शुरू होने जा रहा है, जिसमें शूरवीर कल्ला जी राठौड़ का जन्मोत्सव मनाया जाएगा। कल्ला जी राठौड़ वे शूरवीर थे, जिन्होंने चित्तौड़ पर अकबर के आक्रमण के समय महाराणा उदयसिंह की सेना में शामिल होकर अपनी वीरता का परिचय दिया था। युद्ध में सेनापति जयमल सिंह राठौड़ थे। उनके पांव घायल हुए तो 24 साल के कल्ला जी ने उन्हें कंधों पर बिठाकर चार भुजाओं के साथ युद्ध किया। दो भुजाएं कल्ला जी की और दो जयमल की। जयमल खेत रहे तो कल्ला जी लड़े और उनका सिर कट गया, लेकिन लोकमान्यता है कि उनका कबंध काफी समय तक यानी बिना सिर वाला धड़ काफी समय लड़ता रहा। वे करीब 180 मील रनेला पहुंचे, जहां उनकी जागीर थी।

कल्याण शक्ति पीठ के चैतन्य रावल बताते हैं, यह मेला हर साल मनाया जाता है, क्योंकि कल्ला जी की वीरता ही ऐसी अदभुत थी। कल्ला जी का विवाह हो रहा था और इसी बीच युद्ध के नगाड़े बज गए थे। वे उसी समय अपनी नववधू कृष्णाकंवरी चौहान को वचन देकर युद्ध में चले गए कि युद्ध में चाहे जो हो, लेकिन मैं मिलने जरूर आऊंगा।

कहते हैं कि कल्ला जी का कबंध यानी बिना शीश वाला धड़ चित्तौड़ से चलकर 180 मील दूर सलूंबर के पास रनेला आया और पत्नी के पास आकर शांत हो गया। अाखिर अपने पति के इस गर्वीले बलिदान से गौरवान्वित होकर कृष्णा कंवरी चौहान धूधू करती चिता में बैठ गई और उनका सौंदर्य पति के शौर्य में विलीन हो गया।

रावल के अनुसार मेले में आदिवासी अपने केसरिया ध्वज यानी नेजे लेकर आते हैं और कलाओं का प्रदर्शन करते हैं। इसमें गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तरप्रदेश सहित कई राज्यों से श्रद्धालु आते हैं। जयमल और पत्ता के साथ थे युद्ध में कल्ला जी चितौड़ युद्ध में कल्ला जी जयमल सिंह राठौड़ और पत्ता जी चूंड़ावत के साथ थे। जयमल बदनोर के थे और पत्ता केलवा के थे।

6. Kalyan Singh Chundawat

महाराज कुंवर कल्याणसिंह चुण्डावत (सांगावत) - सर कटने के बाद भी युद्ध लड़ने वाला राजपूत योद्धा

महाराज कुंवर कल्याणसिंह चुण्डावत, मेवाड़ के महाराणा अमरसिंह द्वितीय के समय उनकी सेना में फौजदार थे। कल्याणसिंह चुण्डावत को हुरड़ा गांव की सीमा पर एक सैन्य टुकड़ी के साथ सीमा रक्षा के लिए नियुक्त किया गया था। तब उस समय रणबाज खां की फौज अजमेर से हुरड़ा गांव आ पहुंची, तब हुरड़ा गांव में घमासान युद्ध हुआ और दोनों फौजें आपस में भीड़ गई। कल्याणसिंह चुण्डावत ने वीरता से मुगल सेना का मुकाबला किया और मुगल सेना को आगे बढ़ने से रोका। लेकिन इस लड़ाई में कुंवर कल्याणसिंह चुण्डावत का सिर युद्ध करते हुए कट गया, लेकिन वीर कल्याणसिंह चुण्डावत बिना सिर के युद्ध करते रहे और रणबाज खां की फौज का खूब कत्ले आम किया। इससे रणबाज खां को बहुत नुकसान पहुंचा और शाही मुगल सेना लड़खड़ा कर डरकर भाग गई। कुंवर कल्याणसिंह चुण्डावत का सिर हुरड़ा गांव में तालाब बरेली के पाल के पास गिरा और धड़ लड़ता हुआ हुरड़ा गांव में आकर शांत हुआ और धरती मां की गोद में समा गया। जहां धड़ शांत हुआ वहां चबुतरा बना हुआ है और जहां सिर कटा तालाब बरेली की पाल पर वहां इनकी छतरी बनी हुई है और यह आसपास के गांवों में पूजनीय है।

कुंवर कल्याणसिंह चुण्डावत के साथ में बेंगू गांव के रूद्रभाण सिंह भी काम आए। इनकी छतरी भी कुंवर कल्याणसिंह की छतरी के पास बनी हुई है। विक्रम संवत 1765 कार्तिक बदी 8 को आप दोनों वीरों ने हुरड़ा गांव में वीरगति पाई। विक्रम संवत 1767 में ठा. राज दौलतसिंह ने हुरड़ा गांव में कुंवर कल्याणसिंह चुण्डावत और रूद्रभाण सिंह की छतरी का निर्माण करवाकर मूर्ति स्थापना कराई और डेढ़ बीघा के आसरे में बगीची लगवाई। धन्य है राजपूताने की यह भूमि जहां पर कुंवर कल्याणसिंह चुण्डावत (सांगावत) और रूद्रभाण सिंह जैसे राजपूत वीरों ने जन्म लिया और इस धरती को पावन किया।

7. Balbhaddr Singh शहीद बलभद्र सिंह

बलभद्र सिंह रैकवार 1857 की क्रांति में अवध, उत्तर प्रदेश के प्रतिनिधि चरित्र हैं। मूर्धन्य साहित्यकार अमृतलाल नागर ने अपनी पुस्तक 'गदर के फूल' शहीद बलभद्र सिंह एवं उनके छह सौ साथियों को समर्पित की है।

बलभद्र सिंह

सिपाहियों के विद्रोह के लिए तो गाय-सुअर की चर्बी के कारतूस कारण बने, जबकि अवध के जमींदारो, तालुकेदारों के लिए, जो अंग्रेजों के तंत्र के ही भाग थे, ऐसा कोई कारण भी नहीं था, लेकिन सैकड़ों नाम हैं जो विदेशी राज की प्रतिक्रिया में इस क्रांति और शहादतों का हिस्सा बने। यह विद्रोह उत्तर प्रदेश के क्रांतिकारी चरित्र को उजागर करता है। 1857 का कलेवर विश्व की महानतम फ्रांसीसी राज्य क्रांति से काफी बड़ा था। 1857 की भारतीय क्रांति ने भी एक राष्ट्र का सूत्रपात किया। अगर अमेरिकी क्रांति अमेरिकी एकता का मार्ग प्रशस्त करती है तो 1857 ने भारत के राजनीतिक एकीकरण का रास्ता दिखाया है। दुनिया के इतिहास में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध यह सबसे बड़ा विद्रोह था। इसने साम्राज्य की जड़ें हिला दीं। अगर अंग्रेजों को नेपाल से मदद न मिली होती तो गुलामी का दौर बहुत पहले खत्म हो गया होता।

लखनऊ अंग्रेजों के कब्जे में आ चुका था। बाराबंकी के ओबरी नवाबगंज के मैदान में गदर के सिपाही, दर्जन भर तालुकेदार अपनी इलाकाई सेनाओं के साथ मोर्चे की तैयारी में थे। बहुत से सैनिकों को और खुद बलभद्र सिंह का यह पहला युद्ध अनुभव था और नेतृत्व भी उन्हीं पर था। इस युद्ध में अवध के किसानों ने मशहूर रेजीमेंट हडसन हार्स को भागने पर मजबूर किया। कई तोपे भी कब्जे में ले लीं। दोबारा हुए युद्ध में तीन घटे भीषण संघर्ष हुआ। बहादुरी और जुझारूपन में नवाबगंज का युद्ध कहीं-कहीं हल्दीघाटी को स्पर्श कर जाता है। यह 13 जून 1858 की तारीख थी। इसके 5 दिन बाद 18 जून को हल्दीघाटी की तिथि पड़ती है। नवाबगंज के हवाले से 1576 में हुए हल्दीघाटी युद्ध को याद रखना भी आसान है। युद्ध संवाददाता विलियम रसेल और ब्रिगेडियर होपग्रांट ने अपने डिस्पैच में बलभद्र सिंह की वीरता, युद्ध क्षमता खुले दिल से स्वीकार की है। पहले युद्ध में अंग्रेजों की तोपों पर कब्जा कर लेने के बाद भागते शत्रु का पीछा न करने से अंग्रेजों को पुन: जवाबी हमले का अवसर मिल गया। युद्ध के प्रति पेशेवराना नजरिया न होना बलभद्र सिंह की हार व शहादत का कारण बना। दोपहर का वक्त था, जब घिर गए बलभद्र की गरदन पर पीछे से तलवार का भरपूर वार पड़ता है। किंवदंतियों के अनुसार सर कट जाता है। धड़ गिरता नहीं। हाथ यंत्रवत तलवार चलाते रहते हैं। पीढि़यों बाद भी जन मानस में सुरक्षित हो गई वह स्मृति आज भी बहुत से गीतों, आल्हा और रासो में अभिव्यक्त हो रही है। एक दूसरे युद्ध में बिलग्राम के निकट रूइया किले पर राजा नरपत सिंह की मोर्चेबंदी में ब्रिगेडियर एड्रियन होप सहित बहुत से ब्रिटिश सैनिक मारे गए। रसेल लिखता है कि लखनऊ पर पुन: कब्जे के युद्ध में रूइया युद्ध से थोड़े ही अधिक सैनिक मारे गए थे। रूइया किले के खंडहर आज भी नरपत सिंह के संघर्ष की दास्तान कहते हैं। दूसरा युद्ध फिर उसी गढ़ी पर रक्षात्मक रूप से लड़ा गया। बताते हैं कि तीसरे दिन फाटक खोलकर हुए युद्ध में नरपत सिंह साथियों सहित शहीद हुए।

8 umed singh kumbhawat

9 Dal singh kumbhawat

उम्मेदसिंह और दलसिंह जी कुम्भावत

यह बात माउंडा और मंढोली के युद्ध के समय की है। माऊंडा-मंडोली (तंवरावाटी) का युद्ध भरतपुर के जाट राजा जवाहर सिंह और जयपुर के सूर्यवंशी क्षत्रिय कछवाहा राजा सवाई माधो सिंह प्रथम के बीच सन् 1767 में 14 दिसंबर को लड़ा गया, जिसमे भरतपुर की फ़ौज और जवाहर सिंह को मुंह की खानी पड़ी और रण छोड़ कर भागना पड़ा। इस युद्ध में कई कुम्भावत कच्छावों ने भाग लिया और वीरगति को प्राप्त हुए। माउंडा और मंढोली का युद्ध जब लड़ा जा रहा था, तब उम्मेदसिंह व दलसिंह कुम्भावत का जाटों से युद्ध करते हुए सिर कट गया, लेकिन दोनों कुम्भावत भाई सिर कटने के बाद भी युद्ध मैदान में भयंकर संग्राम करते रहे। उम्मेदसिंह व दलसिंह कुम्भावत ने बिना सिर के सैंकड़ो शत्रुओं को मौत के घाट उतार दिया। उम्मेदसिंह व दलसिंह कुम्भावत का बिना सिर के तलवार चलाने का दृश्य बड़ा ही रोमांचित और अद्भुत था। उम्मेदसिंह व दलसिंह कुम्भावत को बिना सिर के युद्ध करते हुए देखकर जाटों के होश उड़ गए और जाट घबरा गये और युद्ध मैदान से भाग खड़े हुए। उम्मेदसिंह व दलसिंह कुम्भावत का धड़ जाट की राड़ी में आकर शांत हुआ। इस युद्ध को उम्मेदसिंह व दलसिंह कुम्भावत के बाहुबल के कारण, जयपुर के महाराजा सवाई माधोसिंह इस युद्ध को जीत गए। महार गांव में उम्मैदसिंह व दलसिंह कुम्भावत की देवलियां स्थापित है, और उम्मेदसिंह के साथ उनकी पत्नी भी सती हुई थी, उनकी भी देवली वहां स्थापित है। तो इस प्रकार उम्मेदसिंह व दलसिंह कुम्भावत का बिना सिर के लड़ने के कारण उन्होंने कुम्भावत कच्छावा कुल की लाज रखी। हमें गर्व है उम्मेदसिंह व दलसिंह जी जैसे वीरों पर, जिन्होंने राजपूत कुल में जन्म लिया और समस्त राजपूतों को गौरवान्वित किया।

गीत(छावली) उम्मेदसिंह व दलसिंह कुम्भावत का

कुंभा सम रंग दे रिया, कवि, गायक बतेर।

दलजी और उम्मेदसिंह, समर मांवडै सेर।।

कुंभा सम रण राच्चिया, दोऊ कुंभावत वाह।

साख भरै रणौई मझ, अंजै चूतरो आह।।

ऊदावत उम्मेद दल, वीरगति लिय रंग।

गढ़ महार अंजसै अबहुं, मालेसर शिव संग।।

डहर मंढोली मांवडै, जुट्ट जट्ट सूं जंग।

बिन मस्तक रण जूझिया, रंग कुम्भावत रंग।।

सुरपुर कुंभो हरखेवे, महार महोच्छव होय।

मालेश्वर ताण्डव रचै, रंग उम्मैद-दल तोय।।

रावत राजी होरिया, सुर सभा बिज सज्ज।

दल-उम्मेद रण राखली, कुंभावत कुल लज्ज।।

सिर कटिया धड़ मच्चिया, नच्चिया शिव तत्काल।

मुण्ड माल माणक मिल्या, रंग ऊदावत लाल।।

जोड़ायत काटां चढ़ी, सुणर जंग जूंझार।

नयन करै नाराण-सम, नगर म्हार नर नार।।

10 सवाई सिंह भोमिया जी

भोमिया शब्द व उस का अर्थ

आधुनिक युग मे राजपूताना के राजपूतो समेत हिन्दुस्तान के तमाम राजपूतो की जिज्ञासा पश्चिमी राजस्थान मे बहुसंख्यक भोमिया राजपूत उर्फ रजपूतो के इतिहास के बारे मे जानकारी जुटाने की रही है।इसके लिए राजपूती युवा अक्सर इंटरनेट, विकीपीडिया ,सोशल नेटवर्किंग साइट पर जाकर इसके लिए प्रयत्न करते है।जिस पर अक्सर उन्हे नाकामी ही हाथ लगती है।आज मै इसी विषय पर चर्चा करूंगा।

भोमिया राजपूत उर्फ रजपूत, राजपूतो से कोई अलग समुदाय नही है। यह अतीत से ही राजपूत ही है।भोमिया शब्द अतीत मे युध्द मे शौर्य, अद्भुत साहस और वीरता प्रदर्शित करने वाले रजपूत के लिए प्रयुक्त होता था।एक प्रकार से "भोमिया" उस समय की वीरता के लिए राजा द्वारा दी जाने वाली बहुत बडी उपाधि थी।मेवाड अंचल मे जिस प्रकार हरियल सेना होती थी उसी प्रकार मारवाङ अंचल मे भोमिया सेना थी।जो युद्ध मे सबसे आगे रहती थी।यही भोमिया सेना मेवाड़ अंचल मे भी होती थी।मेवाड़ राज्य में बप्पा रावल से लेकर राणा सांगा तक भोमिया सेना का बोलबाला रहा।इस समय तक भोमिया सेना का मेवाड़ राज्य में इतना रूतबा था कि इनका कद राज दरबारियों के बराबर था।यह भोमिया समय समय पर राजा की जरूरत पर युद्ध मे काम आते थे।इसके एवज मे राणा भोमियो को भोम प्रदान करता था और इस भोम का भोमियो से कोई राजकीय कर नही लिया जाता था।राणा द्वारा मिलने वाली ऐसी ही रियायतो से भोमिया कई एकड जमीन के मालिक बन जाते थे।ये भोमिये या रियायती वर्ग राज्य के बडे भूमिपतियों मे शुमार होते थे।

राणा सांगा के बाद के मेवाड़ शासको के शासनकाल मे भोमियो का रूतबा थोड़ा कम जरूर पडा। अब भोमिये केवल युद्ध तक ही सीमित रह गए। अब भी भोमियो को यथावत रूप से लडाई लडने के एवज मे भोम तो दी जाती थी।लेकिन राजदरबार वाले रूतबे मे थोडी कमी जरूर महसूस की गई।इसके उपरान्त भी भोमिये राणा सांगा के बाद के शासको को स्थाई रूप से सैनिक सेवाए देते रहे।

इसी प्रकार मारवाङ अंचल मे भोमिये अतीत से लेकर अजमेर के राजा विग्रहराज चतुर्थ, महान सम्राट पृथ्वीराजचौहान तृतीय, रणथम्भौर के राणाहम्मीरदेव, जोधाणा के महान शासक राव मालदेव, जालौर के सुप्रसिद्ध शासक कान्हङदेव, सिवाना के राव शीतलदेव तथा भीनमाल के प्रतिहार शासको को स्थाई रूप से सैनिक सेवाए देते रहे । इन सेवाओ के बदले मे इन शासको द्वारा भोमियो को भोम प्रदान की जाती थी ।इसके अलावा जालौर के सोनीगरा, जोधाणा के राठौङ, सिवाना के चौहान और भीनमाल के प्रतिहार शासको द्वारा भोमियो को अपनी ओर से कुछ छोटी मोटी जागिरे दी जाती थी।क्योंकि इस भोमिया सेना मे सदा युध्द मे शौर्य, अद्भुत साहस और वीरता प्रदर्शित करने वाले रजपूतो के साथ राजा के कनिष्ठ भ्राता, राजा के सगे संबंधी भी हो थे।इसलिए इन शासको द्वारा भोमियो को बडी संख्या मे जागीरे दी जाने लगी।यह जागीरे छोटी बडी दोनो ही प्रकार की होती थी।कोई कोई जागीरे तो इतनी छोटी होती थी कि उसके नीचे एक या दो गांव ही आते थे।जबकि किसी किसी जागीर के नीचे दस से बारह तक या की किसी के नीचे सोलह गाँव भी आते थे।ये सभी जागीरे अज्ञात है ।क्योंकि उस समय बारीकी से इनका इतिहास नही लिखा गया था।इन जागीरो मे प्रमुख जालौर के पास का चौसठ गांवो का परगना जो "दहियावटी" के नाम से प्रसिद्ध है,इसके अलावा जालौर, पाली,भीनमाल आदि के वे गांव जहा आज भी होली को होलिकादहन के लिए अग्नि(स्थानीय भाषा मे लोपो) भोमिये उर्फ रजपूतो द्वारा दी जाती है।ऐसे सभी गांव अतीत मे भोमिया राजपूतो की जागीरे थी।ऐसे गांवो मे प्रमुख चांदराई

, बाला, जालौर, सिवाना,भीनमाल, पाली के आस पास के भोमिया बहुसंख्यक आबादी वाले गांव है।

इन भोमियो के बारे मे ऐसा कहा जाता है कि यह अपनी भोम से असीम प्रेम करते थे।ये भोमिये अपनी भोम की रक्षा के लिए जान पर खेलकर भी रक्षक बन जाते थे।कही दफा भोमिये शत्रुओं से लडते लडते अपना सिर कलम हो जाने के बाद भी बिना शर वाले धङ के सहारे लडाई जारी रखते है।जो अपने आप मे भोमियॅो का अनूठा और अद्भुत साहस का प्रमाण था।इसी कारण से समय समय पर मारवाङ अंचल के इन शासको द्वारा भोमियो की सेवाऐ ली जाती थी।भोमियो के बारे मे प्रचलित है कि -

"भोमिया राखे इण धरा री लजिया ।

जग म राखियो, रजपूत आपणो नाव।।"

भोमियो के बारे मे एक किवन्दती प्रचलित है कि भोमिये अजमेर के राजा विग्रहराज चतुर्थ तथा पृथ्वीराज चौहान तृतीय के समय तक बराबर अजमेर मे थे।लेकिन पृथ्वीराज चौहान तृतीय द्वारा पहले विग्रहराज चतुर्थ के साथ चल कपट उसके बाद संयोगिता हरण भोमियो को नागवार गुजरा।भोमियो ने इसे अपने ही रजपूत धर्म पर प्रतिघात समझा।इसके बाद भोमियो ने धीरे धीरे अजमेर से पलायन कर दिया।इसके पश्चात भोमियो ने परिस्थितियो के अनुकूल पहले रणथम्भौर के राणा हम्मीरदेव के यहा आ कर बचे।यहा इन्होंने हम्मीरदेव के साथ मिलकर खिलजी से प्रतिरोध करते रहे।यहा भोमियो ने हम्मीरदेव को लगातार सैनिक सेवाए देते रहे।हम्मीरदेव के वीरगति को प्राप्त होने के बाद भोमियो ने जोधाणा और जालौर आंचल की ओर कूच किया। यहा पर जालौर के सुप्रसिद्ध शासक कान्हङदेव, सिवाना के शीतलदेव तथा भीनमाल मे प्रतिहार शासको ने शरणागत के रूप मे शरण दी।ये सभी शासक भोमियो की वीरता और अद्भुत साहस से प्रसन्न होकर स्थायी रूप से अपने सैनिको मे सम्मलित कर लिया तथा समय के साथ इनकी वीरता से प्रभावित होकर उपहार स्वरूप जागीरे देते रहे।

यहा भोमियो ने अपनी योग्यतानुसार पदोन्नति पाकर प्रसन्न होकर स्थायी रूप से यही बच गए।सिवाना मे शीतलदेव की ओर से अल्लाहुद्दीन खिलजी के साथ संघर्ष करते हुए शीतलदेव के साथ कई भोमिया रजपूत वीरगति को प्राप्त हुए।इस युध्द मे रहे बचे भोमियो ने फिर अपनी कर्मभूमि जालौर आंचल को ही चुन ली।जालौर आंचल मे भोमिये कान्हङदेव को लगातार सैनिक सेवाऐ देते रहे।इसी बीच शीतलदेव के वीरगति के प्राप्त होने के बाद खिलजी ने गढ सिवाना को जीतकर जालौर की ओर कूच किया।यहा कान्हङदेव ने भोमियो के साथ मिलकर एक वर्ष तक खिलजी को संघर्ष के लिए मजबूर कर दिया।यहा कान्हङदेव, वीरमदेव तथा भोमियो के अद्भुत साहस और वीरता प्रदर्शित करने के बाद वीरगति को प्राप्त होने से जालौर के स्वर्णगिरी दुर्ग पर खिलजी का विजय पताका फहराया।

कान्हङदेव तथा वीरमदेव के साथ भोमियो के बलिदान के बाद भोमियो के वंशजो ने जालौर ,सिरोही ,बाड़मेर, पाली के अलग अलग क्षेत्रो मे अपने काम के तजुर्बे के अनुसार रोजमर्रा के कार्य करने लगे।इसमे कृषि कार्य प्रमुख था।क्योंकि इन्हे अतीत मे भोम प्रदान होती रहती थी।जिससे इन्हे इस भोम पर कृषि कार्य करने मे सुलभ और सरलता होती थी।धीरे धीरे भोमिये कृषि क्षेत्र मे रम गये तथा यही अपना स्थायी बचेरा बचा लिया।

इसी प्रकार कुछ पाली क्षेत्र के भोमिये इसके पश्चात भी जोधाणा के राठौङ शासको की ओर से युध्द मे शौर्य प्रदर्शित करते रहे।इनमे राव मालदेव का शेरशाह सूरी के साथ लडा गया "सुमेर का युध्द" प्रमुख है।इस युद्ध मे राव मालदेव, राजपूती सिरदारो और भोमिया रजपूतो के अद्भुत साहस और वीरता के प्रदर्शन से शेरशाह सूरी को कहना पडा कि

"मै मुट्ठी भर बाजरे के लिए सारे हिन्दुस्तान का साम्राज्य खो बैठता।"

राव मालदेव के बाद के शासको के समय के यहा के भोमियो ने भी रोजमर्रा के कार्यो की ओर लौटते हुए कृषि कार्य के साथ अपने स्तर के जीवनयापन के कार्य करने लगे।

भोमिये सदा सैनिक सेवाऐ देते रहने के कारण पीढ़ी दर पीढ़ी भले ही राजा न बने हो, लेकिन सत्ता से दूर रहकर भी इन्होने पीढ़ी दर पीढ़ी रजपूती गौरव को बनाए रखा।इसलिए जग मे इन्हे यश प्राप्त है।

एक दोहा है इनकी प्रसिद्धि के लिए -

जग पूजै शूरा नै; शूरा राखे इण री लाज।

जग वसायो शूरै।जग म वाजिया भोमिया।।

11 वीर योद्धा डूंगर सिंह भाटी

सिर कटे धड़ लड़े रखा रजपूती शान

"दो दो मेला नित भरे, पूजे दो दो थोर॥

सर कटियो जिण थोर पर, धड जुझ्यो जिण थोर॥ ”

मतलब :-

एक राजपूत की समाधी पे दो दो जगह मेले लगते है,

पहला जहाँ उसका सर कटा था और दूसरा जहाँ उसका धड लड़ते हुए गिरा था….

राजपुताना वीरो की भूमि है। यहाँ ऐसा कोई गाव नही जिस पर राजपूती खून न बहा हो, जहाँ किसी जुंझार का देवालय न हो, जहा कोई युद्ध न हुआ हो। भारत में मुस्लिम आक्रमणकर्ताओ कोे रोकने के लिए लाखो राजपूत योद्धाओ ने अपना खून बहाया बहुत सी वीर गाथाये इतिहास के पन्नों में दब गयी। इसी सन्दर्भ में एक सच्ची घटना-

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उस वक्त जैसलमेर और बहावलपुर(वर्तमान पाकिस्तान में) दो पड़ोसी राज्य थे। बहावलपुर के नवाब की सेना आये दिन जैसलमेर राज्य के सीमावर्ती क्षेत्रो में डकैती, लूट करती थी परन्तु कभी भी जैसलमेर के भाटी वंश के शासको से टकराने की हिम्मत नही करती थी।

उन्ही दिनों एक बार जेठ की दोपहरी में दो राजपूत वीर डूंगर सिंह जी उर्फ़ पन्न राज जी, जो की जैसलमेर महारावल के छोटे भाई के पुत्र थे और उनके भतीजे चाहड़ सिंह जिसकी शादी कुछ दिन पूर्व ही हुयी थी, दोनों वीर जैसलमेर बहावलपुर की सीमा से कुछ दुरी पर तालाब में स्नान कर रहे थे। तभी अचानक बहुत जोर से शोर सुनाई दिया और कन्याओ के चिल्लाने की आवाजे आई। उन्होंने देखा की दूर

बहावलपुर के नवाब की सेना की एक टुकड़ी जैसलमेर रियासत के ही ब्राह्मणों के गाँव "काठाडी" से लूटपाट कर अपने ऊँटो पर लूटा हुआ सामान और साथ में गाय, ब्राह्मणों की औरतो को अपहरण कर जबरदस्ती ले जा रही है। तभी डूंगर सिंह उर्फ़ पनराजजी ने भतीजे चाहड़ सिंह को कहा की तुम जैसलमेर जाओ और वहा महारावल से सेना ले आओ तब तक में इन्हें यहाँ रोकता हूँ। लेकिन चाहड़ समझ गए थे की काका जी कुछ दिन पूर्व विवाह होने के कारण उन्हें भेज रहे हैँ। काफी समझाने पर भी चाहड़ नही माने और अंत में दोनों वीर क्षत्रिय धर्म के अनुरूप धर्म निभाने गौ ब्राह्मण को बचाने हेतु मुस्लिम सेना की ओर अपने घोड़ो पर तलवार लिए दौड़ पड़े।

डूंगर सिंह को एक बड़े सिद्ध पुरुष ने सुरक्षित रेगिस्तान पार कराने और अच्छे सत्कार के बदले में एक चमत्कारिक हार दिया था जिसे वो हर समय गले में पहनते थे।

दोनों वीर मुस्लिम टुकडी पर टूट पड़े और देखते ही देखते बहावलपुर सेना की टुकड़ी के लाशो के ढेर गिरने लगे। कुछ समय बाद वीर चाहड़ सिंह (भतीजे)भी वीर गति को प्राप्त हो गए जिसे देख क्रोधित डूंगर सिंह जी ने दुगुने वेश में युद्ध लड़ना शुरू कर दिया। तभी अचानक एक मुस्लिम सैनिक ने पीछे से वार किया और इसी वार के साथ उनका शीश उनके धड़ से अलग हो गया। किवदंती के अनुसार, शीश गिरते वक़्त अपने वफादार घोड़े से बोला-

"बाजू मेरा और आँखें तेरी"

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घोड़े ने अपनी स्वामी भक्ति दिखाई व धड़, शीश कटने के बाद भी लड़ता रहा जिससे मुस्लिम सैनिक भयभीत होकर भाग खड़े हुए और डूंगर जी का धड़ घोड़े पर पाकिस्तान के बहावलपुर के पास पहुंच गया। तब लोग बहावलपुर नवाब के पास पहुंचे और कहा की एक बिना मुंड आदमी बहावलपुर की तरफ उनकी टुकडी को खत्म कर गांव के गांव तबाह कर जैसलमेर से आ रहा है।

वो सिद्ध पुरुष भी उसी वक़्त वही थे जिन्होंने डूंगर सिंह जी को वो हार दिया था। वह समझ गए थे कि वह कोई और नहीं डूंगर सिंह ही हैं। उन्होंने सात 7 कन्या नील ले कर पोल(दरवाजे के ऊपर) पर खडी कर दी और जैसे ही डूंगर सिंह नीचे से निकले उन कन्याओं के नील डालते ही धड़ शांत हो गया।

बहावलपुर, जो की पाकिस्तान में है जहाँ डूंगर सिंह भाटी जी का धड़ गिरा, वहाँ इस योद्धा को मुण्डापीर कहा जाता है। इस राजपूत वीर की समाधी/मजार पर उनकी याद में हर साल मेला लगता है और मुसलमानो द्वारा चादर चढ़ाई जाती है।

वहीँ दूसरी ओर भारत के जैसलमेर का मोकला गाँव है, जहाँ उनका सिर कट कर गिरा उसे डूंगरपीर कहा जाता है। वहाँ एक मंदिर बनाया हुआ है और हर रोज पूजा अर्चना की जाती है। डूंगर पीर की मान्यता दूर दूर तक है और दूर दराज से लोग मन्नत मांगने आते हैँ।

शत शत नमन गौ-ब्राह्मण धर्म रक्षक वीर योद्धा डूंगर जी को

12 अचलदास जी खींची

अचलदास जी खींची - एक ऐसा महान योद्धा जिसका सिर कटने के बाद भी धड़ युद्ध लड़ता रहा

राजपूताने की धरती, वीरों की धरती रही हैं। इस धरती के कण कण में वीर योद्धा समाए हुए हैं। राजपूताने की धरती पर ऐसे सैंकड़ों लाखों राजपूत वीर योद्धाओं ने जन्म लिया है, जो युद्धभूमि में सर कटने के बाद भी युद्ध मैदान में दुश्मनों के साथ युद्ध करते रहें। ऐसे ही एक राजपूत वीर योद्धा हुए गागरोण राज्य के अचलदास जी खींची। खींची राजपूत चौहानों की एक प्रमुख शाखा हैं। विक्रमी संवत् 1480 तद्नुसार 1423 ई. में होशंगशाह ने खींची-चौहानों के गागरोण राज्य पर आक्रमण किया। होशंगशाह एक महत्त्वकांक्षी सुल्तान था, सुल्तान का गागरोण पर आक्रमण करने का उद्देश्य वहां की खींची चौहान शाखा को नष्ट करके अपना प्रभुत्व स्थापित करना था। गागरोण पर उस समय अचलदास जी खींची का राज था, जो बड़े ही स्वाभिमानी और गर्वीले वीर थे। होशंगशाह द्वारा गागरोण पर आक्रमण करने पर अचलदास जी खींची बहुत क्रोधित हो गए, और उन्होंने यह निश्चय कर लिया कि सुल्तान होशंगशाह यहां चक्रवर्ती चौहानों से युद्ध करने आया तो है, लेकिन वह और उसकी सेना यहां से जिन्दा लौट नहीं पायेगी। होशंगशाह ने गागरोण के दुर्ग का घेरा डाल दिया और उसने दुर्ग को अपने अधिकार में करने के लिए कई कोशिशें की, परन्तु सुल्तान नाकाम हो गया। तब उसने एक धोबी के साथ मिलकर गागरोण के जलाशय में गोमांस डलवा दिया और जल को दूषित कर दिया। जिसके फलस्वरूप अचलदास जी ने जल को अपवित्र समझकर तथा जीने का अन्य कोई विकल्प न देखकर अचलदास जी ने केसरिया करने का निश्चय कर लिया। केसरिया करने से पहले रानियों और अन्य क्षत्राणियों ने जौहर किया, और इसके बाद अचलदास जी खींची ने अपने वंश बीज की रक्षा खातिर अपने दो सबसे छोटे पुत्रों पाल्हणसी और धीरा को बहुत समझा बुझाकर दुर्ग से बाहर निकालकर महाराणा मोकल के पास मेवाड़ भेज दिया। इसके बाद अचलदास जी खींची ने दुर्ग के कपाट(दरवाजे) खुलवाकर अपने भाई बंधुओं के साथ गढ़ से नीचे उतरकर, अपनी मुंछें तानकर शत्रु-सेना पर शेर की तरह टूट पड़े। अचलदास जी खींची ने बारह दिन तक दुश्मनों के साथ बड़ी वीरता से युद्ध किया और तेरहवें दिन युद्ध करते हुए अचलदास जी खींची का सिर कट गया और सिर कटकर 'भमरपोल' के पास गिर गया, परन्तु सिर कटने के बाद भी अचलदास जी खींची का धड़ दुश्मनों के साथ युद्ध करता रहा और सुल्तान होशंगशाह और उसकी सेना पर विजयश्री प्राप्त करने के बाद अचलदास जी खींची का धड़ 'खसर-तालाब' पर जाकर शान्त हुआ, 'खसर-तालाब' जहां अचलदास जी का धड़ शांत हुआ वहां और 'भमरपोल' जहां अचलदास जी का सर कटा वहां, दोनों स्थानों पर ही स्मारक बना हुआ है और वहां अचलदास जी खींची का पूजन होता है। इस युद्ध में अचलदास जी खींची के दस बड़े पुत्र रणखेत(शहीद) हुए। परंतु अंत में जीत अचलदास जी की हुई थी। तो यह थे, अचलदास जी खींची जो सर कटने के बाद भी लड़ते रहे, और दुश्मनों पर विजय प्राप्त की।

संदर्भ

1. वंश भास्कर

2. अचलदास खींची री वचनिका

3. तबकाते-अकबरी

4. खिल्चीपुर की ख्यात

5. मारवाड़ रा परगना री विगत

13 गोरा-बादल | जानिए इन अविस्मरणीय राजपूत योद्धाओं के बारे में

मेवाड़ की पावन धरती ने कई महान एवं वीर, पराक्रमी योद्धाओं को जन्म दिया है। गोरा एवं बादल उन्ही वीर योद्धाओं में से एक है ,ये धरती हमेशा उनकी कृतज्ञ रहेगी! तो आइए जानते हैं उन दो महान योद्धाओं के बारे में जिनके लिए यह कहा जाता है कि “जिनका शीश कट जाए फिर भी धड़ दुश्मनों से लड़ता रहे वो राजपूत“ ।

गोरा-बादल

गोरा तत्कालीन चित्तौड़ के सेनापति थे एवं बादल उनके भतीजे थे। दोनो अत्यंत ही वीर एवं पराक्रमी योद्धा थे, उनके साहस, बल एवं पुरुषार्थ से सारे शत्रु डरते थे। गोरा एवं बादल इतिहास के उन गिने चुने लड़ाकों में से एक थे जिनके पास बाहुबल के साथ साथ तीव्र बुद्धि भी थी।

इनकी बुद्धि एवं वीरता ने उस असंभव कार्य को संभव कर दिखाया जिसे कोई और शायद ही कर पाता ।

ये ऐसे योद्धा थे जो दिल्ली जाकर खिलजी की कैद से राणा रतन सिंह को छुड़ा लाये थे । इस युद्ध में जब गोरा ने खिलजी के सेनापति को मारा था तब तक उनका खुद का शीश पहले ही कट चुका था, केवल धड़ शेष रहा था । यह सब कैसे संभव हुआ इसका वर्णन मैं मेवाड़ के राज कवि श्री श्री नरेन्द्र मिश्र की अत्यंत खूबसूरत कविता के छोटे से अंश से करता हूँ ।

बात उस समय की है जब खिलजी ने धोके से राणा रतन सिंह को कैद कर लिया था, जब राणा जी दिल्ली में खिलजी की कैद में थे तब रानी पद्मिनी गोरा के पास गयीं; गोरा सिंह रानी पद्मिनी को वचन देते हुए कहते है कि –

जब तक गोरा के कंधे पर दुर्जय शीश रहेगा ।

महाकाल से भी राणा का मस्तक नही कटेगा ।।

तुम निशिन्त रहो महलो में देखो समर भवानी ।

और खिलजी देखेगा केसरिया तलवारो का पानी ।।

राणा के सकुशल आने तक गोरा नही मरेगा ।

एक पहर तक सर तटने पर भी धड़ युद्ध करेगा।।

एकलिंग की शपथ महाराणा वापस आएंगे ।

महाप्रलय के घोर प्रभंजक भी ना रोक पाएंगे ।।

यह शपथ लेकर महावीर गोरा, राणा जी को वापस चित्तौड़ लेन की योजना बनाने लगे ।

योजना के बन जाने पर वीर गोरा ने आदेश दिया कि –

गोरा का आदेश हुआ सजगये सातसौ डोले ।

और बांकुरे बादल से गोरा सेनापति बोले ।।

खबर भेज दो खिलजी पर पद्मिनी स्वंय आती है ।

अन्य सातसौ सतिया भी वो संग लिए आती है ।।

जब यह खबर खिलजी तक पहुँची तो वो खुशी के मारे नाचने लगा ,उसको लगा कि वो जीत गया है। लेकिन ऐसा नहीं था ,पालकियों में तो सशस्त्र सैनिक बैठे थे । एवं पालकी ढ़ोने वाले भी कुशल सैनिक थे ।।

और सातसौ सैनिक जो कि यम से भी भीड़ सकते थे ।

हर सैनिक सेनापति था लाखो से लड़ सकते थे ।।

एक–एक कर बैठ गए, सज गई डोलियां पल में ।

मर मिटने की हौड़ लगी थी मेवाड़ी दल में ।।

हर डोली में एक वीर , चार उठाने वाले ।

पांचो ही शंकर की तरह समर भत वाले ।।

सैनिकों से भरी पालकियां दिल्ली पहुँच गई ।

जा पहुंची डोलियां एक दिन खिलजी की सरहद में ।

उस पर दूत भी जा पहुँचा खिलजी के रंग महल में।।

बोला शहंशाह पद्मिनी मल्लिका बनने आयी है ।

रानी अपने साथ हुस्न की कालिया भी लायी है ।।

एक मगर फरियाद फ़क़्त उसकी पूरी करवादो ।

राणा रतन सिंह से केवल एक बार मिलवादो ।।

दूत की यह बात सुनकर मुगल उछल पड़ा , उसने तुरंत ही राणा जी से पद्मिनी को मिलवाने का हुक्म दे दिया । जब ये बात गोरा के दूत ने बाहर आकर बताई तब गोरा ने बादल से कहा कि –

बोले बेटा वक़्त आगया है कट मरने का ।

मातृ भूमि मेवाड़ धारा का दूध सफल करने का ।।

यह लोहार पद्मिनी वेश में बंदीगृह जाएगा ।

केवल दस डोलियां लिए गोरा पीछे ढायेगा ।।

यह बंधन काटेगा हम राणा को मुक्त करेंगे।

घुड़सवार कुछ उधर आड़ में ही तैयार रहेंगे।।

जैसे ही राणा आएं वो सब आंधी बन जाएँ।

और उन्हें चित्तोड़ दुर्ग पर वो सकुशल पहुंचाएं।।

गोरा की बुद्धि का यह उत्कृष्ट उदाहरण था । दिल्ली में जहाँ खिलजी की पूरी सेना खड़ी है, वहाँ ये चंद मेवाड़ी सिपाही अपनी योजना, बुद्धि एवं साहस से राणा को छुड़ाने में कामयाब हो जाते हैं। राणा के वहाँ से प्रस्थान करने से पूर्व वीर गोरा, अपने भतीजे बादल से कहते है कि –

राणा जाएं जिधर शत्रु को उधर न बढ़ने देना।

और एक यवन को भी उस पथ पावँ ना धरने देना।।

मेरे लाल लाडले बादल आन न जाने पाए ।

तिल तिल कट मरना मेवाड़ी मान न जाने पाए ।।

यह सुनकर बादल बोले कि –

ऐसा ही होगा काका राजपूती अमर रहेगी ।

बादल की मिट्टी में भी गौरव की गंध रहेगी ।।

बादल के ये वचन सुनकर गोरा ने उसे अपने हृदय से लगा लिया!!! लेकिन इस पूरी योजना का क्रियान्वय किस प्रकार हुआ इसका वर्णन महा कवि श्री नरेंद्र मिश्र कि निम्न पंक्तिया करती है –

गोरा की चातुरी चली राणा के बंधन काटे ।

छांट छांट कर शाही पहरेदारो के सर काटे ।।

लिपट गए गोरा से राणा गलती पर पछताए ।

सेनापति की नमक हलाली देख नयन भर आये ।।

राणा ने पूर्व में जिस सेनापति का तिरस्कार किया था , संकट की घड़ी में आखिर वो ही काम आया ।यह देख कर राणा के नैन भर आए ।। लेकिन अब तक खिलजी के सेनापति को लग गया था कि कुछ गड़बड़ है ।

जब उसने लिया समझ पद्मिनी नहीँ आयी है।

मेवाड़ी सेना खिलजी की मौत साथ लायी है ।।

तो उसने पहले से तैयार सैनिक दल को बुलाया और रण छेड़ दिया ।

दृष्टि फिरि गोरा की मानी राणा को समझाया ।

रण मतवाले को रोका जबरन चित्तोड़ पठाया ।।

उस समय राणा को सुरक्षित अपने देश पहुचना तथा शत्रु देश से निकलना अधिक महत्वपूर्ण था, राणा ने परिस्थिति को समझा और मेवाड़ की ओर प्रस्थान किया ।।

खिलजी ललकारा दुश्मन को भाग न जाने देना ।

रत्न सिंह का शीश काट कर ही वीरों दम लेना ।।

टूट पड़ों मेवाड़ी शेरों बादल सिंह ललकारा ।

हर हर महादेव का गरजा नभ भेदी जयकारा ।।

निकल डोलियों से मेवाड़ी बिजली लगी चमकने ।

काली का खप्पर भरने तलवारें लगी खटकने ।।

राणा के पथ पर शाही सेनापति तनिक बढ़ा था ।

पर उस पर तो गोरा हिमगिरि सा अड़ा खड़ा था।।

कहा ज़फर से एक कदम भी आगे बढ़ न सकोगे ।

यदि आदेश न माना तो कुत्ते की मौत मरोगे ।।

रत्न सिंह तो दूर न उनकी छाया तुम्हें मिलेगी ।

दिल्ली की भीषण सेना की होली अभी जलेगी ।।

यह कह के महाकाल बन गोरा रण में हुंकारा ।

लगा काटने शीश बही समर में रक्त की धारा ।।

खिलजी की असंख्य सेना से गोरा घिरे हुए थे ।

लेकिन मानो वे रण में मृत्युंजय बने हुए थे ।।

बादल की वीरता की हद यहा तक थी कि इसी लड़ाई में उनका पेट फट चुका था । अंतड़िया बाहर आ गई थी तो भी उन्होंने लड़ना बंद नही किया , अपनी पगड़ी पेट पर बांधकर लड़ाई लड़ी ।

रण में दोनों काका-भतीजे और वीर मेवाड़ी सैनिकों के इस रौद्र प्रदर्शन का वर्णन कवि नरेन्द्र मिश्र इस प्रकार करते है-

पुण्य प्रकाशित होता है जैसे अग्रित पापों से ।

फूल खिला रहता असंख्य काटों के संतापों से ।।

वो मेवाड़ी शेर अकेला लाखों से लड़ता था ।

बढ़ा जिस तरफ वीर उधर ही विजय मंत्र पढता था ।।

इस भीषण रण से दहली थी दिल्ली की दीवारें ।

गोरा से टकरा कर टूटी खिलजी की तलवारें ।।

मगर क़यामत देख अंत में छल से काम लिया था ।

गोरा की जंघा पर अरि ने छिप कर वार किया था ।।

वहीँ गिरे वीर वर गोरा जफ़र सामने आया ।

शीश उतार दिया, धोखा देकर मन में हर्षाया ।।

शीश कटने के बाद भी उन्होंने एक ही वार में मुग़ल सेनापति को मार गिराया था । इस अद्भुत दृश्य का वर्णन निम्न पंक्तियों में है ।।

मगर वाह रे मेवाड़ी गोरा का धड़ भी दौड़ा ।

किया जफ़र पर वार की जैसे सर पर गिरा हथौड़ा ।।

एक वार में ही शाही सेना पति चीर दिया था ।

जफ़र मोहम्मद को केवल धड़ ने निर्जीव किया था ।।

ज्यों ही जफ़र कटा शाही सेना का साहस लरज़ा ।

काका का धड़ देख बादल सिंह महारुद्र सा गरजा ।।

अरे कायरो नीच बाँगड़ों छल से रण करते हो ।

किस बुते पर जवान मर्द बनने का दम भरते हो ।।

यह कह कर बादल उस क्षण बिजली बन करके टुटा था ।

मानो धरती पर अम्बर से अग्नि शिरा छुटा था ।।

ज्वाला मुखी फटा हो जैसे दरिया हो तूफानी ।

सदियां दोहराएंगी बादल की रण रंग कहानी ।।

अरि का भाला लगा पेट में आंते निकल पड़ी थीं ।

जख्मी बादल पर लाखो तलवारें खिंची खड़ी थी ।।

कसकर बाँध लिया आँतों को केशरिया पगड़ी से ।

रंचक डिगा न वह प्रलयंकर सम्मुख मृत्यु खड़ी से ।।

अब बादल तूफ़ान बन गया शक्ति बनी फौलादी ।

मानो खप्पर लेकर रण में लड़ती हो आजादी ।।

उधर वीरवर गोरा का धड़ अरिदल काट रहा था ।

और इधर बादल लाशों से भूतल पाट रहा था ।।

आगे पीछे दाएं बाएं जम कर लड़ी लड़ाई ।

उस दिन समर भूमि में लाखों बादल पड़े दिखाई ।।

मगर हुआ परिणाम वही की जो होना था ।

उनको तो कण कण अरियों के शोणित से धोना था ।।

मेवाड़ी सीमा में राणा सकुशल पहुच गए थे ।

गोरा बादल तिल तिल कटकर रण में खेत रहे थे ।।

एक एक कर मिटे सभी मेवाड़ी वीर सिपाही ।

रत्न सिंह पर लेकिन रंचक आँच न आने पायी ।।

गोरा बादल के शव पर भारत माता रोई थी ।

उसने अपनी दो प्यारी ज्वलंत मणियां खोयी थी ।।

धन्य धरा मेवाड़ धन्य गोरा बादल बलिदानी ।

जिनके बल से रहा पद्मिनी का सतीत्व अभिमानी ।।

जिसके कारन मिट्टी भी चन्दन है राजस्थानी |

दोहराता हूँ सुनो रक्त से लिखी हुई क़ुरबानी ||

तो ये थी मेवाड़ के अमर शहीद गोरा एवं बादल की गौरव गाथा ।

ये है हमारे असली नायक जो की हमारे लिए हमेशा प्रेरणा के स्त्रोत है ।।

इनको पढ़ो, इनके बारे में जानो, इनके जैसे बनो ।।जय मेवाड़।। जय हिंद ।